आँकड़ों से परे · हिंदी संस्करण · अंक ०५
मेरे प्रेसिडेंट
प्रेसिडेंट बैठे नहीं थे। वे डूब रहे थे। न बोलते, न देखते, न आदेश देते। बमुश्किल साँस लेते। उन दिनों में से एक, जब सबसे महान आदमी भी ठंड में छोड़े गए बच्चों जैसे दिखने लगते हैं।
मैंने उन्हें दूर से देखा और एक सज्जनतापूर्ण मुलाक़ात तय कर दी — दो स्त्री-मित्राएं। वे चुपचाप उनके पास आ बैठीं। न कोई शृंगार, न कोई उकसावा। बस उपस्थिति। मानो किसी ने उन्हें वहाँ उस खालीपन को भरने के लिए बिठाया हो जो भरने से इनकार कर रहा था।
उन्होंने अपनी आँखें उतनी ही मेहनत से उठाईं जितनी एक आदमी पत्थर उठाते वक़्त करता है, मुझे देखा, और गम्भीर भाव से पूछा: ये कौन हैं, नान्दो? मैं बिना जवाब दिए मुस्कुरा दिया। उन्होंने फ़िर पूछा:
— “नान्दो… क्या तुम्हें लगता है… क्या ये वेश्याएँ हैं?”
उनकी आवाज़ टूटी हुई थी। न कोई व्यंग्य, न कोई द्वेष। बस डर। यह डर कि वे एसे आदमी बन गए हैं जिसे अकेलापन महसूस न करने के लिए किसी को पैसे देने पड़ते हैं।
उन्होंने अपने पूरे जीवन में कभी किसी स्त्री को पैसे नहीं दिए थे — पर अक्सर उनके लिए अपनी जेबें ख़ाली कर दी थीं। पहली जेब: नोटों की मोटी गड्डी, ताक़त दर्शाने के लिए। बाक़ी: खुले पैसे, मानो कह रहे हों, मैं बस उतना ही ख़र्च करता हूँ जितना चुनता हूँ।
मैं धीरे-धीरे पास गया, जैसे कोई किसी किनारे पर खड़े इंसान के पास जाता है।
— “नहीं, प्रेसिडेंट। ये वेश्याएँ नहीं हैं।”
उन्होंने घूँट भरी, मानो किसी फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे हों।
— “तो फ़िर ये क्या हैं?”
— “ये विकल्प हैं, प्रेसिडेंट।”
ख़ामोशी। पहले उन्हें समझ नहीं आया। फ़िर अर्थ पहुँचा।
— “विकल्प… किसका?”
— “उस सबका, जो तुम अब अकेले महसूस नहीं कर सकते।”
दोनों स्त्रियों ने मुझे देखा, पर अपनी आँखें नीची नहीं कीं। वे लेती हैं — हमेशा — पर कभी माँगतीं नहीं। वे बहकाने नहीं आई थीं। वे एक काले सूराख़ को भरने के लिए मौजूद थीं।
प्रेसिडेंट ने धीरे से साँस ली। एक आँसू — बस एक — बिना आवाज़ के गिरा।
— “नान्दो… मैं गिर रहा हूँ।”
— “मैं जानता हूँ, प्रेसिडेंट। पर आज नहीं।”
और उस पल, एक क्षण के लिए, वे फ़िर से ख़ुद बन गए। न कोई भूमिका। न कोई प्रतीक। बस एक आदमी।
मेरे प्रेसिडेंट का वह आदमी।
नमस्ते, पेप्पे