हिन्दी संस्करण · VATICAN SAGA · 09/17
जिएगा, मरेगा
संचार करने वाले पहले लोग बिना कपड़ों के आदिम मनुष्य थे। सूचना देने वाले पहले लोग कपड़ों वाले आदिम मनुष्य थे, और प्रेस कार्ड के साथ। फिर भी आदिम मनुष्य। कुछ नहीं बदला। सिवाय इसके कि पहलों को ज़िंदगी से बचकर निकलना था। दूसरे बचे हुओं को दोबारा ज़िंदा करके रोज़ी कमाते हैं।
यहाँ बहस या आलोचना के लिए समय नहीं है। मैंने कभी इनमें से कुछ नहीं किया। मैं जो करना चाहता हूँ, वह है कहानियों के ज़रिए दोनों के बीच का नृवैज्ञानिक फ़र्क़ बताना।
संचार का पहला सच्चा रूप — और यहाँ हर कोई अपनी कुर्सी से उछल पड़ेगा — ख़ामोशी है।
शब्द से पहले। आवाज़ से पहले। इशारे से पहले। मुद्रा से पहले। ख़ामोशी ने हमेशा किसी की बुद्धि को इससे नापा है कि वह कितना संसाधित कर पाता है और तय कर पाता है। कभी उल्टा नहीं।
और आदमी, इकट्ठे बैठे, चुप रहे। तारों को देखते हुए। अमूर्त को। कल्पित को। तब तक, जब तक दूर कहीं औरतों का एक झुंड — इस भरोसे में कि वे अकेली हैं — आपस में बात करने न लगा। धीमी आवाज़ें। संयत लहजा। संयत लय। एक व्यवस्थित ताल। हर शब्द सावधानी से रखा हुआ। कुछ भी संयोग पर नहीं छोड़ा गया।
पर ख़ामोशी ने मानवता को जो पहला सबक़ छोड़ा, वह भीतर की झिझक नहीं है। वह एक तरीक़ा है। हर उस जगह के भीतर की आख़िरी सरहद जहाँ असली फ़ैसले होते हैं।
और ख़ामोशी के भीतर का शोर वह एक चीज़ है जो कभी ग़ायब नहीं होती। वह भीतर से आता है। भावनात्मक और संज्ञानात्मक। तार्किक और विवेकपूर्ण। सहज और स्नेहिल। सब एक साथ।
उसे सचमुच सँभाल पाने वाली, हमेशा की तरह, केवल औरतें रहती हैं। इतनी पूर्ण, इतनी कारगर, कि मानव प्रजनन को आगे ले जाने का काम भी उन्हीं को सौंपा गया।
बाक़ी सब कुछ जो मैंने यहाँ नहीं कहा, उसे मैं हर किसी के अपने अनुभव पर छोड़ता हूँ। हम जो हैं, उसका सबसे अच्छा हिस्सा यही है।
सूचना मुझे बचपन के एक खेल की याद दिलाती है। सब गोल घेरे में। पहला आदमी अगले के कान में एक शब्द फुसफुसाता है। वह क़तार में बारह लोगों से होकर गुज़रता है। दूसरे सिरे से जो निकलता था, वह आम तौर पर हँसी का धमाका होता था।
खेल एक ही शब्द पर चल सकता था या पूरे वाक्य पर। होता यह था।
शुरू कीजिए जिएगा से। बारह बार गुज़रने के बाद, दूसरे सिरे से जो शब्द निकला वह था मरेगा।
शुरू कीजिए हम सब जानते थे कि वह जिएगा से। बारह बार गुज़रने के बाद वह इस तरह लौटा: सब जानते थे कि वह मर चुका था। अंतिम संस्कार 12 तारीख़ को 12:00 बजे तय। हा हा हा हा।
आज मैं मीडिया को सूचना घुमाते ठीक इसी तरह देखता हूँ। किसी ख़बर की वही शुरुआती पंक्ति, एक के बाद एक माध्यम में अलग-अलग तरह से छपी हुई।
जिसे हम बच्चों का खेल समझते थे, वह एक ऐसे उद्योग की कड़वी सच्चाई है जहाँ अख़बार के खोखे और न्यूज़रूम के बीच फ़र्क़ करने को कुछ बचा ही नहीं।
आख़िर में, दोनों चीज़ों में एक ही धागा साझा है। वे दोनों एक ही आदिम उद्गम की संतानें हैं। बस यह देखना काफ़ी है कि लोग कपड़े कैसे पहनते हैं।
एक आख़िरी बात, ताकि किसी को ग़लतफ़हमी न हो। मैं यह दावा नहीं कर रहा कि मैं धरती पर बचा आख़िरी आदमी हूँ। सिर्फ़ आख़िरी से पहले वाला। आख़िरी अब भी क़तार में आगे कहीं है, किसी के कान में फुसफुसाता हुआ।
Ferdinando
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