जिलेट अवसाद के पार · हिंदी संस्करण · क्रमांक 11
जिलेट: यह कहानी कोई कभी नहीं सुनाता
दूसरे विश्व युद्ध के ख़त्म होने पर, हर कोई थककर चूर था।
हारे हुए वह सब कुछ खो रहे थे जिसे पक्का करने में उन्होंने बरसों लगाए थे। जीतने वालों ने जंग जीत ली थी, पर अब उन्हें तय करना था कि भविष्य कैसा दिखेगा।
लोग थके हुए थे, फिर भी उम्मीद से भरे। कोई हार मानने को तैयार नहीं था। यही इंसानी फ़ितरत है। पर हम यह कभी न भूलें कि हर मर्द के पीछे आम तौर पर एक औरत होती है, भले ही इतिहास उसका ज़िक्र कम ही करता हो।
अमेरिका तबाह अर्थव्यवस्थाओं को फिर से खड़ा करने में मदद के लिए अपना हुनर निर्यात कर रहा था। साथ ही, वह वही कर रहा था जो अमेरिका हमेशा सबसे अच्छा करता आया है: धंधा। कारख़ाने बढ़े, मुनाफ़े बढ़े, और हर साल नए उत्पाद आते गए। कुछ मौजूदा ज़रूरतों का जवाब थे। दूसरों ने ऐसी चाहतें पैदा कीं जिनके होने का लोगों को पता तक न था। 1950 के दशक के आख़िर की ओर, कंडोम के पहाड़ बाज़ार में उमड़ पड़े। आधिकारिक वजह काफ़ी सीधी थी: बीमारी से बचाव। मरना कोई नहीं चाहता था।
पर हर तमग़े के एक से ज़्यादा पहलू होते हैं।
यह उत्पाद कुछ ख़ास सस्ता नहीं था, और इसका नियमित इस्तेमाल बटुए से कुछ वफ़ादारी माँगता था। यह एक छोटा-सा निवेश बन गया।
हर कोई कम से कम एक साथ रखता था। छिपाकर। तह करके। बटुए में भेस बदले, सही आपात घड़ी के इंतज़ार में।
नतीजा वही हुआ जिसका अंदाज़ा था।
जन्म दर गिरने लगी।
सबसे पहले इस पर ध्यान गया दूध की बोतलें और चुसनियाँ बनाने वाली एक जर्मन कंपनी का। लेखाकारों ने इसे सबसे पहले देखा। बिक्री घट रही थी। खपत घट रही थी। कम बच्चों का मतलब था कम ग्राहक।
बैठकें हुईं।
योजनाएँ बनीं।
निवेश के प्रस्ताव रखे गए।
पर एक बुनियादी दिक़्क़त थी।
बच्चे प्रयोगशाला में ख़रीदे नहीं जा सकते।
उन्हें पैदा होना पड़ता है।
कंपनी हल ढूँढ़ने में जूझती रही। कुछ भी काम करता नहीं दिख रहा था।
फिर मालिक ने नेपल्स के पास के एक अहम इतालवी ग्राहक से मिलने का फ़ैसला किया, एक बड़े थोक व्यापारी से, जिसमें भारी मात्रा में माल खपाने का ग़ज़ब का हुनर था।
कारोबारी बैठक अच्छी रही।
उस शाम, ग्राहक ने उसे खाने पर बुलाया।
खाने के बाद, ठेठ इतालवी अंदाज़ में, मेहमान को बताया गया कि रात के लिए एक “कंबल” का इंतज़ाम कर दिया गया है।
बस, यह कोई मामूली कंबल नहीं था।
शयनकक्ष में पचहत्तर साल की एक रूसी औरत इंतज़ार कर रही थी, जो पूरे भरोसे से अपनी उम्र चालीस बताती थी।
उसके मुताबिक़, साथ पहले आता था।
पैसा तो महज़ एक बहाना था।
उसका ज़ोर था कि एहसानमंदी से सब कुछ समझ में आ जाता है।
जर्मन को पूरा यक़ीन नहीं हुआ।
मुझे भी नहीं है।
सच तो यह है कि वह शक की हद तक मुझ जैसी सुनाई देती थी, और मेरे उस कमबख़्त एक डॉलर वाले प्रस्ताव जैसी।
जब वे अपनी शाम की रस्म पूरी कर चुके, तो जर्मन कारोबारी आख़िरकार इतना ढीला पड़ा कि वह दिक़्क़त क़बूल कर ले जो उसे सता रही थी।
रूसी औरत ने सब्र से सुना। फिर, जैसा औरतें सदियों से करती आई हैं जब मर्द बैठकें करते रहते हैं, उसने सदी का विचार पेश कर दिया।
“अपना ख़ुद का कंडोम कारख़ाना लगाओ।”
कारोबारी उसे ताकता रह गया।
उसकी समझ में नहीं आया कि कंडोम का दूध की बोतलों और चुसनियों से क्या लेना-देना।
उसकी उलझन देखकर, वह आगे बोली।
“कच्चा माल पहले से ही दक्षिण-पूर्व एशिया से आता है। उत्पादन की लागत कम रखी जा सकती है। ढुलाई का आख़िरी क़ीमत पर नाममात्र असर पड़ता है। बढ़िया माल, पहुँच में आने वाले दामों पर बेचो। मुनाफ़े के एक हिस्से को निवेश समझो।”
जर्मन को अब भी कड़ी जुड़ती नहीं दिखी।
फिर आया असली विचार।
“हर सौ कंडोम जो बनें, उनमें से दस ख़राब बनाओ।”
कारोबारी का दम घुटते-घुटते बचा।
“ख़राब?”
“बस एक नन्हा-सा छेद। सुई जितना। जो दिखे नहीं।”
ख़ामोशी।
फिर उसने जोड़ा:
“बाक़ी काम बच्चे सँभाल लेंगे।”
जर्मन ठहाका मारकर हँस पड़ा।
आख़िर वह जर्मन था, और जर्मन आम तौर पर चमत्कारों से ज़्यादा आँकड़ों को पसंद करते हैं।
पर घर लौटती उड़ान में, हँसी फीकी पड़ गई।
विचार बचा रहा।
फिर वह एक ख़याल बना।
फिर एक संभावना।
फिर एक मंत्र।
आख़िरकार उसने रूसी औरत को फ़ोन किया और उसे परियोजना से जुड़ने का न्योता दिया।
मेहनताने के मामले में उसने उसे पूरी छूट दी।
अपने माहवार चेक पर वह जो भी रक़म लिखना चाहे, मंज़ूर होगी।
जन्म फिर बढ़े।
खपत फिर बढ़ी।
दूध की बोतलों का धंधा फिर चल निकला।
और, वक़्त के साथ, लोग कंडोम को लगभग भूल ही गए।
कुछ तो उन्हें धोने, सूखने के लिए टाँगने, और दोबारा इस्तेमाल करने भी लगे।
थोड़ा-सा नेपल्स वाला जादू।
फर्दिनांदो
