जिलेट: जिएँ क्यों?

Gillette: Why Live? — Past The Gillette Depression, chapter 06

जिलेट अवसाद के पार · हिंदी संस्करण ·  क्रमांक 06

जिलेट: जिएँ क्यों?

जिलेट ऑडियो — नांदो, लेखक — gillettenarrative.com


जब मुझसे पूछा गया कि ज़िंदगी क्या है, तो मैंने साफ़ कहा — अपने नज़रिये से — कि उसे एक बाक़ायदा एल्गोरिदम कहा जा सकता है। उसके भीतर, दो छोर: जन्म और मृत्यु।

बहुत-से लोग मुस्कुराए। लगभग मेरी खिल्ली उड़ाते हुए, मानो जवाब तो ज़ाहिर था। पर इंसान स्वभाव से उलझन ढूँढ़ता है। उलझन से गुज़रकर ही उसे चीज़ों की अहमियत समझ आती है। जैसे वे ढेरों किताबें जो अमेज़न बेचता है — जिन्हें लिखने का ऑर्डर कंप्यूटरों को दिया गया, क्योंकि मुझ जैसे लेखकों ने मना कर दिया।

पर इनमें से कुछ भी असली नहीं दिख सकता, सच नहीं हो सकता, उन तमाम लोगों की आँखों में जो लगातार आगे बढ़ते रहने की ज़रूरत भी जताते हैं और मजबूरी भी — बजाय इसके कि बिना किसी क़ाबू के, काँटेदार तारों की बाड़ में क़ैद रह जाएँ, सिर्फ़ अपने ही दिमाग़ के शिकार।

तब कसरत आसान हो जाती है। जब वे कहते हैं: बताओ तुम कहाँ जा रहे हो और मैं बता दूँगा तुम कौन हो। या: बताओ तुम किसके साथ चलते हो और मैं बता दूँगा तुम कौन हो। या: जो लँगड़े के साथ चलता है, वह देर-सबेर लँगड़ाने लगता है।

हल वही रहता है। हर किसी की जेब में। अपने फ़ैसलों के साथ अकेले रहिए — यह याद रखते हुए कि हमें कोई उतना प्यार नहीं करता जितना हम ख़ुद को करते हैं।


नांदो

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