जिलेट की सबसे भीड़ भरी जगह

जिलेट की सबसे भीड़ भरी जगह — जिलेट, रोगी की गाथा, अध्याय 07

जिलेट, रोगी की गाथा · हिंदी संस्करण  ·  अंक 07

जिलेट की सबसे भीड़ भरी जगह


(उनकी नज़र से, जो अब भी इंतज़ार में हैं)

“क्लिनिक मरीज़ों का इलाज करता है। देखभाल करने वाला समुदाय लोगों को सहारा देता है।”

I. सबसे भीड़ भरी जगह

किसी स्वास्थ्य संस्थान में सबसे भीड़ भरी जगह कौन-सी होती है?

हॉल नहीं।

क्लिनिक नहीं।

प्रतीक्षा-कक्ष नहीं।

गलियारे भी नहीं।

सबसे भीड़ भरी जगह वह है जो किसी नक़्शे में नहीं दिखती।

वह भविष्य है।

जो भी भीतर आता है, अपने साथ एक सवाल लेकर आता है।

रोगी।

परिवार।

डॉक्टर।

नर्सें।

निदेशक।

वह भी, जो फ़र्श साफ़ करता है।

कोई सचमुच नहीं जानता कि अंत कैसा होगा — या शायद डर के मारे सब नाटक करते हैं।

और फिर भी, हर कोई अगले दिन की योजनाएँ बनाता रहता है।

मैंने और कहीं इतने लोगों को एक साथ एक ही वर्तमान में जीते, और ज़िद के साथ एक ही भविष्य में बसते नहीं देखा।

इसीलिए मैं मानता हूँ कि क़ब्रिस्तान वह सबसे भीड़ भरी जगह है जो मैंने आज तक जानी है।

II. उपसंहार

बहुत-से लोग सोचते हैं कि ज़िंदगी का उलटा मौत है।

मुझे इतना यक़ीन नहीं।

पुनर्वास केंद्रों, अस्पतालों, वृद्धाश्रमों और क़ब्रिस्तानों में वक़्त बिताने के बाद मैं एक अलग नतीजे पर पहुँचा हूँ।

ज़िंदगी का उलटा मौत नहीं है।

भुला दिया जाना है।

और शायद इसी वजह से क़ब्रिस्तान उन सबसे भीड़ भरी जगहों में से एक है जिन्हें मैं जानता हूँ।

लोगों से नहीं।

याद से।

सारी उम्र हम क़ब्रिस्तान से डरते हैं।

बचपन में हमें सिखाया जाता है कि वह अंत की जगह है।

बड़े होकर हम उससे कतराना सीख लेते हैं।

हम वहाँ फ़र्ज़ निभाने जाते हैं, बरसियों पर, आदर के नाते।

हम चुपचाप भीतर जाते हैं और जितनी जल्दी हो सके निकल आते हैं।

और फिर भी, ग़ौर से देखने पर मैंने पाया कि क़ब्रिस्तान मृतकों की जगह नहीं है। मृतक वहाँ नहीं हैं।

वे उन घरों में हैं जिनमें वे रहे।

उन शब्दों में जो वे छोड़ गए।

उन हाव-भावों में जो हमने उनसे सीखे।

उन ख़ामियों में जो हमें विरासत में मिलीं।

उन ग़ैरमौजूदगियों में जो हमसे बोलती रहती हैं।

क़ब्रिस्तान ज़िंदा लोगों की जगह है।

उनकी, जो लौटकर आते हैं।

उनकी, जो याद रखते हैं।

उनकी, जिनके पास अब भी किसी ऐसे से कहने को कुछ है जो अब जवाब नहीं दे सकता। और यह आपसे वह कह रहा है जो वहाँ हो आया है, पर जिसे वहाँ जगह नहीं मिली।

III. लेखक-पृष्ठ

यह रचना किसी के कहने पर नहीं लिखी गई।

इसे बेचा नहीं गया।

यह किसी व्यावसायिक मक़सद से नहीं बनाई गई।

यह पुनर्वास के, मानवीय गरिमा के और लोगों के आपसी रिश्ते के मूल्य की गवाही देने के लिए लिखी गई।

माँगा गया एकमात्र मेहनताना एक प्रतीकात्मक डॉलर है — रचना की क़ीमत के तौर पर नहीं, बल्कि देखभाल, उम्मीद और ज़िम्मेदारी की संस्कृति के प्रति साझा प्रतिबद्धता के साक्ष्य के तौर पर।


फर्दिनांदो

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