एक साथ बहुत अधिक यथार्थ

एक साथ बहुत अधिक यथार्थ — GILLETTEVATICANO 11

हिन्दी संस्करण  ·  VATICAN SAGA · 11/17

एक साथ बहुत अधिक यथार्थ


उन्होंने मुझे पागल कहा। एक से ज़्यादा बार। कभी इसलिए कि मैं बहुत ज़्यादा सोचता था। कभी इसलिए कि मैं बहुत ज़्यादा महसूस करता था। और कभी सिर्फ़ इसलिए कि मैं चीज़ों को दूसरे कोण से देखता था।

समय के साथ मैंने समझा कि पागलपन अक्सर वह लेबल है जो हम उस चीज़ पर चिपकाते हैं जिसे हम वर्गीकृत नहीं कर पाते।

यह वही औज़ार है जो मंदिर ने इस्तेमाल किया था। एक श्रेणी दे दो। एक लेबल ढूँढ़ लो। आदमी को उसी चीज़ का छोटा संस्करण बना दो जिसे तुम पहले से जानते थे। शब्द सदी के साथ बदलता है। काम नहीं बदलता।

फिर भी एक तरह का पागलपन है जो हद से ज़्यादा संवेदनशीलता से जन्मता है। हद से ज़्यादा सवाल करने से। बिना गहराई वाली सतहों को स्वीकार न कर पाने से।

पागलपन एक ऐसा कमरा है जहाँ विचार भाषा से तेज़ दौड़ता है। जहाँ भावनाएँ एक साथ आ पहुँचती हैं। जहाँ दिल अपने दरवाज़े बंद नहीं कर पाता।

जो भी उसमें से गुज़रता है, वह बदले बिना बाहर नहीं आता। क्योंकि उसने कुछ देख लिया है। और जो देख लिया गया, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

बहुत लोग मानते हैं कि पागलपन बुद्धि का उलटा है। मैं क़ायल नहीं हूँ। कभी-कभी वे क़रीबी रिश्तेदार हैं। कभी-कभी पागलपन वह बुद्धि है जो अपनी आख़िरी हद तक पहुँच गई है। वह बिंदु जहाँ उसे और रोका नहीं जा सकता। जहाँ उसे बहुत सारे संबंध दिखते हैं। बहुत सारे अर्थ। एक साथ बहुत अधिक यथार्थ।

और जब ऐसा होता है, तो भाषा काफ़ी नहीं रहती। सिर्फ़ इशारा—या ख़ामोशी—एक अधूरे अनुवादक के तौर पर बची रहती है।

यह कमरे का एक आधा हिस्सा है। बाहर से देखो तो यह अति है। भीतर से देखो तो यह कुछ और ही है।

एक इलाक़ा है जिसे कम लोग पहचानते हैं। वह अराजकता और स्पष्टता के बीच है। घाव और समझ के बीच। ढहने और पुनर्जन्म के बीच। मैं उसे सुबोध पागलपन कहता हूँ।

वहाँ संबंध दिखने लगते हैं। मुखौटे गिरते हैं। ब्योरे बोलने लगते हैं।

इसे समझाना मुश्किल है। जिन्होंने इसे कभी नहीं जिया, वे इसे भ्रम समझ बैठते हैं। सच में, यह उलटा है। यह हद से ज़्यादा स्पष्टता है। एक साथ देखा गया बहुत अधिक यथार्थ।

जो सुबोध पागलपन में जीते हैं, वे भटके हुए नहीं हैं। वे बस उन जगहों से गुज़र रहे हैं जहाँ दूसरे अभी पहुँचे नहीं।

एक बार हम एक ऐसे ग्राहक के पास गए जो कभी समय पर भुगतान नहीं करता था। उसकी देरियाँ उसे लगातार बक़ाया खातों की सूची में लौटा लाती थीं। यहाँ तक कि क्रेडिट मैनेजर भी इसमें शामिल हो गया। वह मिलान से आया था। ज़्यादा विश्लेषणात्मक। ज़्यादा तार्किक। कम भावुक। फिर भी ग्राहक सुनने को तैयार नहीं था।

समय बीता। एक दिन मैं उससे फिर मिला। मैंने कहा:

“बधाई हो। आपका नाम अब बक़ाया सूची में नहीं है। आख़िरकार आप भी सबके जैसे हो गए।”

उसने मुझे देखा। मुस्कुराया। और जवाब दिया: “मेरे प्यारे दोस्त, दोबारा देखो। अगर तुमने मुझे नहीं देखा, तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं वहाँ नहीं हूँ।”

उस पल मैं कुछ समझा। सुबोध पागलपन उसे देखना नहीं है जो मौजूद नहीं है। यह उसे देखना है जो मौजूद है, जब बाक़ी सब कहीं और देख रहे होते हैं।

अति और दृष्टि दो कमरे नहीं हैं। वे एक ही कमरा हैं, और आप कौन-सा दरवाज़ा इस्तेमाल करते हैं, यही तय करता है कि आप उसे क्या नाम देंगे। जो इसे पागलपन कहते हैं, वे बाहर खड़े हैं। वे कमरे का वर्णन नहीं कर रहे। वे फ़ॉर्मैट का बचाव कर रहे हैं। और फ़ॉर्मैट ने आज तक किसी को उसके बाहर जीने के लिए माफ़ नहीं किया।


Ferdinando

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