मौसी विल्किंसन से मुलाक़ात

मौसी विल्किंसन से मुलाक़ात — विल्किंसन गाथा, अध्याय 11

विल्किंसन गाथा · हिंदी संस्करण  ·  अंक 11

मौसी विल्किंसन से मुलाक़ात


जब मुझे लगा कि आख़िरकार हमारी बातचीत शुरू करने की घड़ी आ गई है, उन्होंने कमान सँभाल ली।

“मेरे साथ दूसरे कमरे में आओ।

तुम्हें कुछ दिखाना है।”

“क्या?”

हम एक हॉल में दाख़िल हुए, लगभग उतना बड़ा जितना मेरा मौजूदा अपार्टमेंट है।

क़रीब एक सौ सत्तर वर्ग मीटर।

उसके बीचोबीच बिलियर्ड की एक मेज़ थी।

उन्होंने पूछा कि क्या मैं यह खेल जानता हूँ।

क्या खेल लेता हूँ।

मैंने कहा, हाँ।

मैंने समझाया कि गोरित्सियाना, यानी पारंपरिक इतालवी क़िस्म, मुझे ख़ास पसंद नहीं, और मैं अमेरिकी पूल को तरजीह देता हूँ।

वे मुस्कुराईं।

“इसमें कोई शक नहीं।

मुझे पहले से पता था।”

मैंने फ़ौरन मौक़ा लपक लिया।

मैंने पूछा कि क्या उन्होंने महारानी की ख़ुफ़िया सेवा पर पैसा ख़र्च किया है, क्या मेरी किताबें मुफ़्त में पढ़ी हैं, या बस मेरी माँ से मेरे बारे में पूछ लिया है।

उन्होंने जवाब नहीं दिया।

या शायद ख़ामोशी से जवाब दिया।

फिर वे मुझे एक लंबी मेज़ की ओर ले गईं।

उस पर छुरी-काँटों के सेट, मैनीक्योर किट, पेडीक्योर किट और निजी देखभाल की ढेरों चीज़ें सजी थीं।

सब कुछ चमकाए हुए इस्पात का था।

हर एक चीज़ हर हफ़्ते चमकाई जाती थी, ताकि उसकी चमक बनी रहे।

पर मेरा ध्यान इस पर नहीं अटका।

हर चीज़ पर एक ही निशान था।

दो तलवारें।

ब्रांड।

दस्तख़त।

पहचान।

विल्किंसन स्वॉर्ड।

मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

पहली बार मैं सचमुच समझा कि मैं कहाँ हूँ।

मैं किसी मैनेजर का मेहमान नहीं था।

मैं किसी बड़े अफ़सर का मेहमान नहीं था।

मैं किसी कॉरपोरेट किंवदंती का मेहमान भी नहीं था।

तभी मैंने औरतों की आवाज़ें सुनीं, जो उन्हें पुकार रही थीं।

“मौसी…

मौसी…

आप कहाँ हैं?”

बिना झिझके उन्होंने जवाब दिया:

“अभी आई।

मैं अपने भांजे के साथ हूँ।

जिलेट के बेटे के साथ।”

उस पल मेरे मन में कोई शक नहीं बचा।

मैं अपनी मौसी के घर में था।

हम दूसरे कमरे में लौटे।

सब निकलने को तैयार थे।

सब, मेरे सिवा।

मैगी ने मेरी बाँह थामी और कहा:

“आओ, तुम्हें अपनी बेटी और अपनी दोनों नातिनों से मिलवाऊँ।

दोनों में से किसी की शादी नहीं हुई है।

चलो।

तुम्हें कुछ दिखाना चाहती हूँ।

उम्मीद है, तुम्हें ख़ुशी होगी।”

सच कहूँ तो मैं पूरी तरह नशे में था।

शराब के नहीं।

जानकारियों के।

जज़्बात के।

वक़्त के।

अब मुझसे कुछ भी सँभल नहीं रहा था।

और वे, वह छोटी-सी अंग्रेज़ बुढ़िया, एक भूकंप थीं।

मैं तुरंत सोचने लगा कि जवानी में वे कैसी रही होंगी।

और क्या कोई कभी उन्हें सँभाल पाया होगा।

जवाब ख़ुद-ब-ख़ुद आ गया।

नहीं।

वे इससे परे थीं।

वे इस्पात की औरत थीं।

हम एक वीरान फ़ैक्टरी के सामने पहुँचे।

वे रुक गईं।

चुपचाप उसे देखती रहीं।

फिर बोलीं:

“फर्नांदो।

सब कुछ यहीं से शुरू हुआ था।

और अगर वे तुम्हें पहले जानते होते, तो आज भी हमारी कंपनी हमारे पास होती।

घटिया प्रबंधन और अहंकारी फ़ैसलों की वजह से हमें उसे बेचने पर कभी मजबूर न होना पड़ता।”

उनकी बेटी।

उनकी नातिनें।

सब चुप।

डोमिनिक भी भावुक लग रहा था।

फिर उसने कहा:

“यह वही जज़्बाती सैर है जो बूढ़ी मालकिन अपने मेहमानों पर रंग जमाने के लिए हमेशा कराती हैं।

हमेशा वही अंग्रेज़ी रस्म।”

पर इस बार वे किसी मेहमान से बात नहीं कर रही थीं।

वे अपने भांजे से बात कर रही थीं।

सैर ख़त्म हुई तो वे मुझे गाड़ी से होटल छोड़ आए।

लौटने को मैंने ही कहा था।

एक ही दिन में इतने जज़्बात सोख लेने को मैं तैयार नहीं था।

पर अगले दिन हम फिर मिलने वाले थे।


फर्दिनांदो

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