विल्किंसन के साथ अगला दिन

विल्किंसन के साथ अगला दिन — विल्किंसन गाथा, अध्याय 13

विल्किंसन गाथा · हिंदी संस्करण  ·  अंक 13

विल्किंसन के साथ अगला दिन


संदेश साफ़ था।

“12:00 बजे होटल के सामने रहना।

मैं अपनी बेटी और नातिनों के साथ आऊँगी।

हम तुम्हें लंच पर ले चलेंगे।

फिर दोपहर साथ बिताएँगे, और उम्मीद है तुम्हें बोर नहीं करेंगे।”

मैं मुस्कुराया।

पिछले दिन जो कुछ मैंने जिया था, उसके बाद बोरियत का डर तो मुझे सबसे कम था।

वे वक़्त की पाबंद निकलीं।

पूरी तरह पाबंद।

पर इस बार कुछ अलग था।

ड्राइवर नहीं था।

ड्राइवर को छुट्टी दे दी गई थी।

स्टीयरिंग पर मैगी थीं।

मानता हूँ कि मैंने ईश्वर से एक छोटी-सी प्रार्थना की।

आध्यात्मिक कारणों से नहीं।

मोटर-गाड़ी वाले कारणों से।

मुझे उम्मीद थी कि सब ठीक रहेगा।

बिना किसी चौंकाने वाली बात के।

कम से कम उस क़िस्म की नहीं।

पर वे पूरी तरह सहज लग रही थीं।

वे स्टीयरिंग उसी भरोसे से थामे थीं जिससे वे बातचीत चलाती थीं।

या कोई फ़ैसला लेती थीं।

या किसी बैठक की अध्यक्षता करती थीं।

एक बात मन में आई।

हर कोई एक ही तरह बूढ़ा नहीं होता।

कुछ लोग गाड़ी चलाना छोड़ देते हैं।

कुछ सफ़र करना छोड़ देते हैं।

कुछ फ़ैसले लेना छोड़ देते हैं।

मैगी नहीं।

वे बस चलती रही थीं।

जैसे ख़ुद वक़्त ने आदर में एक तरफ़ हट जाने का फ़ैसला कर लिया हो।

हम लंदन पार करते हुए आगे बढ़ते रहे।

आगे की सीट उन्होंने मेरे लिए रखी थी।

वह सीट जो आम तौर पर मेहमान को दी जाती है।

मैगी गाड़ी चला रही थीं।

उनकी बेटी और नातिनें पीछे बैठी थीं।

देखने में एक आम परिवार लगता था।

पर था नहीं।

कुछ मिनट बाद उन्होंने पूछा कि मैं क्या खाना चाहूँगा।

कोई ख़ास पसंद है क्या।

मैंने बिना झिझके जवाब दिया।

“बेशक अंग्रेज़ी खाना।”

सब ठहाका मारकर हँस पड़ीं।

शिष्टाचार वाली हँसी नहीं।

असली हँसी।

बेसाख़्ता।

मैगी अपनी बेटी की ओर मुड़ीं।

उनके चेहरे पर उस इंसान का भाव था जिसने अभी-अभी कोई सिद्धांत साबित कर दिया हो।

“अब समझीं, मैंने तुमसे वे बातें क्यों कही थीं?”

उनकी बेटी एक शब्द जोड़े बिना मुस्कुरा दी।

जैसे मेरे जवाब ने किसी ऐसी बात पर मुहर लगा दी हो जिस पर वे बहुत पहले चर्चा कर चुकी थीं।

मैंने इसका मतलब नहीं पूछा।

कभी-कभी सवाल बहुत जल्दी आ जाते हैं।

जवाबों को तो अपना वक़्त चाहिए।

मैं बस उस अजीब अंग्रेज़ परिवार को देखता रहा।

और मुझे लगा कि कहीं, हमारे मिलने से बहुत पहले, मैगी तय कर चुकी थीं कि मैं कौन हूँ।

मैं तो बस अब जाकर वहाँ पहुँच रहा था।

हम एक रेस्तराँ पहुँचे।

अंग्रेज़ अभिजात वर्ग की भव्य विलासिता वाली जगहों में से कोई नहीं।

कोई वर्दीधारी दरबान नहीं।

रुतबे का कोई दिखावा नहीं।

कोई बनावटी नफ़ासत नहीं।

उसी पल मुझे यक़ीन हो गया कि हम अच्छा खाने वाले हैं।

पाक-कला चीज़ों की कला जैसी है।

सबसे सादी चीज़ें लगभग हमेशा सबसे अच्छी होती हैं।

और मैगी ठीक ऐसी ही थीं।

वे क़िले में रहकर उसे विला कह सकती थीं।

वे रानी की तरह बोल सकती थीं और लंदन के टैक्सी ड्राइवर की तरह गाड़ी चला सकती थीं।

वे एक अंग्रेज़ लेडी की गरिमा खोए बिना आपको अपने ही इतिहास के खंडहरों तक ले जा सकती थीं।

पर जब खाने की बारी आती, वे सार चुनती थीं।

दिखावा नहीं।

शायद इसी वजह से मैं उन्हें सुनता रहा।

उनकी तलवारों के इस्पात के पीछे मुझे कोई संस्था नहीं मिली थी।

मुझे एक औरत मिली थी।


फर्दिनांदो

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