विल्किंसन गाथा · हिंदी संस्करण · अंक 14
एक विल्किंसन विदाई की ख़ामोशी
कैसी अजीब क़िस्मत रही है मेरी।
हमेशा अकेला।
इतनी सारी औरतों के बीच बैठा हुआ।
कभी केंद्र में नहीं।
बस एक मेहमान।
सच कहूँ तो यह भूमिका मुझे कभी असहज नहीं लगी।
कुछ और था जो हमेशा मेरा ध्यान खींच लेता था।
कुछ ऐसा जो औरतें बिना पूछे ले लेती हैं।
पैसा नहीं।
वह तो हमेशा सबसे कम दिलचस्प हिस्सा रहा है।
वे ध्यान ले लेती हैं।
जिज्ञासा।
ख़याल।
वक़्त के टुकड़े।
आपकी संज्ञानात्मक ऊर्जा के पूरे-पूरे हिस्से।
और ज़्यादातर बार उन्हें इसका पता भी नहीं चलता।
पहला नियम हमेशा वही रहा।
उनके चेहरे पर मुस्कान लाओ।
पर बेवक़ूफ़ बने बिना।
क्योंकि हास्य और मूर्खता में बड़ा फ़र्क़ है।
पहला बातचीत खोलता है।
दूसरी उसे बंद कर देती है।
वरना सबसे शानदार डिनर भी आख़िर में फ़ास्ट-फ़ूड के खाने से ज़्यादा कुछ नहीं रह जाता।
तभी मैंने इस्पात के बारे में अपना निजी मानवशास्त्रीय सिद्धांत समझाना शुरू किया।
मुझे उम्मीद थी कि मैं विश्वसनीय लगूँगा।
ज़रूरी नहीं कि मुझ पर यक़ीन किया जाए।
मैंने एक बहुत पुरानी सुबह की कल्पना की।
एक आदमी अपनी गुफा से निकला था, किसी से प्रेम-मुलाक़ात के लिए।
पर उसकी संगिनी का उसे जाने देने का कोई इरादा नहीं था।
वह जंगल में उसके पीछे-पीछे चली।
वह जानना चाहती थी कि वह कहाँ जा रहा है।
किसके साथ।
और क्यों।
उन दिनों हर कोई आज़ाद था, और स्वच्छंद यौनाचार का आविष्कार समाजशास्त्रियों ने अभी नहीं किया था।
किसी पल वह आगबबूला हो गया।
उसने एक पत्थर उठाया और औरत को भगाने के लिए उसकी तरफ़ फेंका।
पत्थर एक चट्टान से टकराया।
एक चिंगारी।
फिर दूसरी।
फिर धुआँ।
बाक़ी काम हवा ने कर दिया।
और आग का जन्म हुआ।
प्रेम-मुलाक़ात वहीं ख़त्म हो गई।
जो हुआ था वह कहीं ज़्यादा अहम था।
उसका ज़िक्र अभी किसी मैनुअल में नहीं था।
अमेज़न के मैनुअलों में भी नहीं।
उसे देखना था।
समझना था।
इस्तेमाल करना था।
मेज़ पर बैठी औरतें चुपचाप सुन रही थीं।
कोई खा नहीं रहा था।
वेटर को सूप वापस रसोई में ले जाकर दूसरी बार गर्म करने पड़े।
फिर कुछ और भी अनोखा हुआ।
पास की मेज़ों पर बैठे कई जोड़ों ने अपनी कुर्सियाँ हमारे क़रीब खिसका लीं।
लगता था जैसे कोई नाटक चल रहा हो।
जबकि मैं तो बस उनके चेहरे पर मुस्कान लाना चाहता था।
यही वह पल था जब मैं विश्वसनीय नहीं रहा।
और मुझ पर यक़ीन किया जाने लगा।
मैं एक ऐसी कहानी सुना रहा था जो किसी ने कभी नहीं लिखी थी।
हमारे पुरखों की एक मुमकिन कहानी।
मैं रुका।
मैंने मैगी की ओर देखा।
“क्या आप चाहती हैं कि मैं आगे सुनाऊँ?”
वे एक पल को भी नहीं झिझकीं।
“हाँ, शानदार हरामज़ादे।”
और हम सब ठहाका मारकर हँस पड़े।
फिर मैंने आगे सुनाया।
आग के साथ औरत समझने लगी कि इस खोज को खाने के काम में लाया जा सकता है।
आँच ने स्वाद बदल दिए।
उसने ख़ुद प्रकृति को बदल डाला।
बिना किसी के जाने, इंसान की औसत उम्र, जो मुश्किल से बीस बरस तक पहुँचती थी, धीरे-धीरे चालीस की ओर बढ़ी।
आग ने उसे दुगना कर दिया था।
जीवाणुओं से होने वाला दूषण घटा।
संक्रमण पीछे हटे।
इंसानी शरीर को वक़्त मिल गया।
फिर, एक आम-सी दोपहर, एक गुफा के सामने, उसी औरत ने कुछ पत्थर उठाए।
उन्हें ग़ौर से परखा।
उन्हें आपस में टकराया।
उनका अध्ययन किया।
बिना धमन भट्ठियों के।
बिना इस्पात कारख़ानों के।
बिना इंजीनियरों के।
उसने वह लंबा सफ़र शुरू किया जो आख़िरकार धातु तक ले जाने वाला था।
और बाद में, इस्पात तक।
इसीलिए, अगर एक औरत न होती, तो आज मैं यहाँ न होता।
मैं आपसे कभी न मिला होता।
मैं कभी आपकी क़द्र न कर पाता।
जो मैं बन गया हूँ, उसे मैं कभी एक विदाई में लपेट न पाता।
मेज़ पर ख़ामोशी छाई रही।
बाक़ी सब ख़ामोशियों से अलग ख़ामोशी।
वह इंतज़ार की ख़ामोशी नहीं थी।
वह विदाई की ख़ामोशी थी।
मैंने मैगी को देखा।
मैंने उनकी बेटी को देखा।
मैंने उनकी नातिनों को देखा।
और मैं समझ गया कि मैं किसी परिवार को अलविदा नहीं कह रहा था।
मैं एक कहानी को अलविदा कह रहा था।
विल्किंसन परिवार
आपका स्वागत है।
मैं उठा और चला गया।
क्योंकि औरत के आँसू मुझसे कभी सहे नहीं गए।
फर्दिनांदो
01 सुश्री विल्किंसन — इस्पात की लेडी · 02 जिलेट मैन के अनुसार विल्किंसन की कहानी · 03 शिक, विल्किंसन और तिहरी बदक़िस्मती · 04 जंग में दो तलवारें: जिलेट बनाम विल्किंसन · 05 विल्किंसन की बाज़ार हिस्सेदारी · 06 विल्किंसन स्वॉर्ड: घर की बदली · 07 विल्किंसन की आईने वाली ग़लती · 08 लेडी विल्किंसन स्वॉर्ड · 09 लेडी विल्किंसन & नैरेटिव · 10 मेरी लेडी विल्किंसन · 11 मौसी विल्किंसन से मुलाक़ात · 12 विल्किंसन के लंदन में राज़ खोलता विराम · 13 विल्किंसन के साथ अगला दिन · 14 एक विल्किंसन विदाई की ख़ामोशी · 15 सुश्री विल्किंसन ने मुझे भांजा कहा
