वॉल स्ट्रीट का बैग

The Wall Street Bag — Gillette From Wall Street, chapter 01

GILLETTE FROM WALL STREET

वॉल स्ट्रीट का बैग

WALL STREET · 01


शुक्रवार की शाम जब मेरे पिता काम के सिलसिले में पाँच दिन बाहर रहकर घर लौटते, तो थककर चूर होते।

लगभग हर हफ़्ते वे मुझसे कहते कि गैराज जाकर उनकी गाड़ी से दो चीज़ें ले आऊँ: फ़ाइल और बैग।

उन्हें दोनों चाहिए होते थे।
रात ठीक 9:30 बजे एक इंस्पेक्टर का फ़ोन आता और आँकड़े तैयार होने चाहिए थे।

यह हमारी शुक्रवार की रस्म बन गई।
मैंने कभी शिकायत नहीं की।
मैं यह अपने पिता के लिए करता था।
मैं यह हमारे लिए करता था।

आँकड़े कभी ग़लत नहीं निकले।
नतीजे कभी उम्मीद से कम नहीं रहे।
और मैंने उन्हें कभी ग़ुस्से में नहीं देखा।

बचपन में मुझे यक़ीन हो चला था कि उनके पास कोई जादुई बैग है।

पर घर में मेरी माँ अक्सर मुझसे अपना बैग और अपना बटुआ मँगवाती थीं।
वह मेरा पहला सबक़ था।
दो बिलकुल अलग चीज़ों का नाम एक हो सकता है।

एक बड़ा, काम से भरा हुआ।
एक छोटा, पैसों से भरा हुआ।

बरसों बाद, जाड़े की एक शाम, मैं और मेरे पिता एक अंतिम संस्कार से लौट रहे थे।
मज़दूर आंदोलन की वजह से लगे नाकों ने हमें उस रास्ते पर डाल दिया जिससे हम आम तौर पर कभी नहीं जाते थे।

एक अँधेरी सड़क के किनारे, छोटे-छोटे अलावों के पास, कई औरतें खड़ी थीं।
हर एक के पास एक हैंडबैग था।

मैंने पूछा कि वे कौन हैं।
मेरे पिता मुस्कुराए।

“ये काम की तलाश में निकली महिलाएँ हैं।”

मैंने बैगों की ओर देखा।
“ये अपने औज़ार साथ लेकर चलती हैं,” उन्होंने समझाया।
“और इनके ग्राहक कौन हैं?”
“वे लोग जो अच्छे कर्म करते हैं।”

मैं दस साल का था।
ज़ाहिर है, मैंने मान लिया कि जो लोग कर्मों का कारोबार करते हैं, उनका किसी न किसी तरह उन औरतों से भी वास्ता पड़ता होगा। यह ग़लतफ़हमी मुझे पूरी तरह तर्कसंगत लगी।

बरसों बाद मेरे पिता मुझे मिलान ले गए।
पहली बार मैंने इतालवी वित्त के मंदिर, पियात्सा अफ़्फ़ारी, में क़दम रखा।

ट्रेडिंग फ़्लोर चीख़-पुकार से भरा था।
ख़रीदते हुए लोग।
बेचते हुए लोग।
काग़ज़ के टुकड़े यूँ लहराते हुए लोग मानो पूरी सभ्यता उन्हीं पर टिकी हो।

मैंने उलझन में चारों ओर देखा।
“ये सब चिल्ला क्यों रहे हैं?”

मेरे पिता हँस पड़े।
“यह धंधा ऐसे ही चलता है।”

मैं फ़ौरन असहमत हुआ।
मैंने उन्हें पंद्रह साल काम करते देखा था।
उन्हें कभी चिल्लाने की ज़रूरत नहीं पड़ी थी।

हम पागलों की तरह हँसे।
वह शाम नाविल्यी पर ख़त्म हुई, जहाँ मेरी यादें एक बार फिर आपस में घुल-मिल गईं।

सड़क किनारे की औरतें।
उनके हैंडबैग।
शेयर बाज़ार के कारोबारी।
उनके ब्रीफ़केस।

अलग बाज़ार।
अलग माल।
वही इंसानी तलाश।

उनमें से कुछ आदमी लगभग कुछ भी ख़रीद सकते थे।
जो चीज़ें उन्हें मुश्किल से हासिल होती थीं, वे थीं भावनाएँ।
वे प्यार ख़रीदने की उम्मीद रखते थे।
आम तौर पर वे कुछ और ही ख़रीदते थे।

फिर मेरी मौसी थीं।
वे अपना मेकअप हैंडबैग के भीतर छिपाकर रखती थीं, क्योंकि उनके ईर्ष्यालु पति का मानना था कि ख़ूबसूरती को अपने आप झलकना चाहिए।

जब वे पूरी तरह सजी-सँवरी घर लौटतीं, तो पति गर्व से मुस्कुराते।
“आज तुम बहुत अच्छी लग रही हो।”
“क्या सेहतमंद रंगत है।”
और वे चुपचाप सिर हिला देतीं।

एक और बैग।
एक और राज़।
एक और बाज़ार।

बड़ा होते-होते मुझे पता चला कि दुनिया में कई तरह के बैग होते हैं।

कुछ में आँकड़े होते हैं।
कुछ में पैसा होता है।
कुछ में ख़्वाहिशें होती हैं।
कुछ में झूठ होते हैं।
और कुछ में पूरी की पूरी ज़िंदगियाँ होती हैं।


फर्दिनांदो फ्रेगा
ब्लेडफ्रेगा
वॉल स्ट्रीट गाथा

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