वॉल स्ट्रीट की हाथ देखने वाली — अगली कड़ी II
WALL STREET · 11
मैंने मियामी लौटने की योजना बना ली थी।
छह महीने।
आराम करने, अपनी स्पैनिश पर धार चढ़ाने और क्यूबाई औरतों को क़रीब से पढ़ने के लिए काफ़ी वक़्त।
वे हमेशा से मेरा पसंदीदा शिकार रही थीं।
मैं एक सुपरमार्केट में दाख़िल हुआ, और क़िस्मत ट्रॉली से पहले वहाँ पहुँच गई।
एक औरत मेरे सामने आ खड़ी हुई।
क्यूबाई।
मैंने उसे फ़ौरन पहचान लिया।
उसने मुझे पहचान लिया।
वह कुछ सेकंड मुझे घूरती रही।
फिर बोली:
“कमबख़्त, तुम यहाँ कर क्या रहे हो?”
“राशन की ख़रीदारी।”
“नहीं। मेरा मतलब धरती पर। तुम्हें तो अब तक नरक में होना चाहिए था न?”
मैंने उसकी अंग्रेज़ी की तारीफ़ की।
बेदाग़।
बेहतरीन औरतें हमेशा एक साथ दो शख़्स बन लेती हैं:
मीठी, जब उन्हें जानकारी चाहिए,
बेरहम, जब वह मिल जाए।
उसने पूछा कि मैं कैसा हूँ।
मेरी सेहत कैसी है।
मैं अब तक ज़िंदा कैसे हूँ।
मेरी पत्नी कहाँ है।
और, सबसे बढ़कर:
“तुम जवान कैसे बने रहे और ख़ुद शैतान को कैसे मात दे दी?”
मैंने उससे कहा कि मुझे बस पकड़नी है।
यह बात सच थी।
कहाँ की, यह मैंने नहीं बताया।
मैंने अलविदा कहा और ग़ायब हो गया।
· · ·
घर लौटकर मैं फ़ौरन सो गया।
सपने में मैंने किसी को इटली वाले अपने घर की सीढ़ियाँ चढ़ते देखा।
मैं उसे जानता था।
या शायद नहीं जानता था।
फिर अचानक समझ में आया।
वही था।
सिनसिनाटी वाला भारतीय।
वही, दस्तख़त किए हुए डॉलर के नोट वाला।
वह सबसे ऊपर की सीढ़ी पर पहुँचा।
मुझे गले लगाया।
उस ब्रिटिश ठहराव के साथ मुस्कुराया जो कुछ भारतीयों पर ख़ुद अंग्रेज़ों से कहीं बेहतर फबता है। फिर उसने मेरी ओर देखा, संजीदा होकर।
“फ्रेगा, मेहरबानी करके — बाथरूम किधर है?”
मैं हड़बड़ाकर जाग उठा।
बाथरूम का दरवाज़ा ढूँढ़ने निकला।
फिर समझ आया कि मैं अब भी सपने के भीतर हूँ।
मैं पलटा।
लाल आरामकुर्सी पर कोई बैठा था।
फिर वही।
बोस्टन का भूत।
हँसता हुआ।
“मुझे पता था कि तुम डरे नहीं हो। तुम टट्टों वाले मर्द हो।”
फिर उसने अपने बग़ल में किसी की ओर इशारा किया।
“देखो, मैं किसे लाया हूँ।”
· · ·
एक लंबी औरत।
नफ़ीस।
अमेरिकी।
चालीस के आसपास।
किसी बड़े अधिकारी की-सी मुद्रा।
उसकी-सी नज़र जो उन काग़ज़ों पर दस्तख़त करता है जिनसे दूसरों की ज़िंदगियाँ ख़त्म होती हैं।
उसने हाथ बढ़ाया।
“कॉपीराइट ऑफ़िस। वॉशिंगटन डी.सी.”
मैंने सिर हिलाया।
“क्या ग़ज़ब की तरक़्क़ी है। यहाँ कैसे आ पहुँचीं?”
“मुझे तुम्हारा एक ईमेल मिला था।”
“और फिर?”
“मैंने उसे पढ़ा।”
“और फिर?”
“मेरा दिल झेल नहीं पाया।”
भूत ठहाका मारकर हँस पड़ा।
मैं नहीं हँसा।
“मुझे अफ़सोस है।”
“अफ़सोस मत करो।”
“नहीं, सच में।”
“नहीं, सच में — मुझे भी।”
· · ·
वह बैठ गई।
कमरे को परखा।
मुझे परखा।
फिर बोली:
“तुम वही आदमी हो जिसका मैं पूरी ज़िंदगी इंतज़ार करती रही।”
“किसी से मिलने के लिए यह इंतज़ाम कुछ पेचीदा लगता है।”
“इससे अच्छा मुझे कुछ मिला नहीं।”
“नहीं। मेरा यक़ीन करो। यह सबसे अच्छा नहीं था।”
वह पल भर के लिए चुप हो गई।
फिर मैंने उससे वह अकेला सवाल पूछा जो मायने रखता था।
“कॉपीराइट ऑफ़िस से पहले — तुम कहाँ काम करती थीं?”
“एक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी में। डिटर्जेंट।”
“कैसा था?”
“टारगेट पूरे करने के लिए मरना पड़ता है।”
“मतलब?”
“अक्षरशः। वे तब तक काम लेते हैं जब तक तुम फट न जाओ।”
· · ·
मैं चुप रहा।
फिर मुस्कुराया।
“मुझे अफ़सोस है, जानेमन।”
“किस बात का?”
“तुमने ग़लत आयाम चुन लिया।”
“क्या कहा?”
“ज़िंदगी में बात हमेशा — सिर्फ़ और सिर्फ़ — स्टाइल की होती है।”
मैंने खिड़की की ओर इशारा किया।
धरती अब भी वहाँ बाहर थी।
उलझी हुई।
शोर से भरी।
मुसीबतों से भरी।
“मैं सबकी सुनता हूँ।”
“भूतों की भी?”
“ख़ास तौर पर उनकी।”
“तो फिर हमारे साथ क्यों नहीं चलते?”
“क्योंकि यहाँ नीचे मुझे अभी कुछ पूरा करना बाक़ी है।”
बोस्टन के भूत ने सिर हिलाया।
अधिकारी ने नज़रें झुका लीं।
वह मायूस लग रही थी।
· · ·
मैं उठ खड़ा हुआ।
दरवाज़े तक गया।
फिर पलटा।
“वैसे —”
“क्या?”
“इत्तफ़ाक़ से, मैं भी डिटर्जेंट में ही हूँ।”
“तो?”
“पर मैं अपने टारगेट पूरे करने के लिए किसी के मरने का इंतज़ार नहीं करता।”
भूत हँसते-हँसते लोटपोट हो गया।
वह मुस्कुराई — पहली बार।
जब मैंने दोबारा आँखें खोलीं, तो मैं अकेला था।
कमरे में कोई नहीं बचा था।
कोई भूत नहीं।
कोई अधिकारी नहीं।
बाथरूम ढूँढ़ता कोई भारतीय नहीं।
बस लाल आरामकुर्सी।
अब भी मुझे ताकती हुई।
मानो उसे पहले से पता हो कि अगली रात कौन आने वाला है।
फर्दिनांदो फ्रेगा
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