जिलेट अवसाद
THE SYSTEM · 02
जब आप पूरी उम्र एक ब्रांड के भीतर बिताते हैं, तो उस नाम की ताक़त आपकी पहचान को कई गुना कर देती है। आप सिर्फ़ आप नहीं रह जाते — आप ही कंपनी बन जाते हैं, जहाँ भी जाएँ, जिस भी कमरे में क़दम रखें।
और फिर एक दिन सब ख़त्म हो जाता है। रिटायरमेंट, कंपनी का बिक जाना, पुनर्गठन, समय से पहले विदाई का प्रोत्साहन, पीठ पर थपकी जितना शालीन। हवा रुख़ बदल लेती है, और कोई आपको नहीं बताता कि ठीक कब।
तभी अवसाद आता है। इसलिए नहीं कि पैसा रुक जाता है। इसलिए कि समाज अब उसे पहचानता नहीं।
वह उन्हीं कमरों में दाख़िल होता है, और कमरा अब पलटकर नहीं देखता। जो नाम कभी हर दरवाज़ा खोल देता था, अब कुछ नहीं खोलता, क्योंकि वह नाम कभी उसका था ही नहीं — उधार का था, तब तक के लिए क़र्ज़ पर मिला हुआ जब तक बैज चलता रहा।
और यह रही वह बात जो कोई ऊँची आवाज़ में कहना नहीं चाहता: “पेशा” के ख़ाने में वे लिखेंगे कर्मचारी, सेल्समैन, एजेंट, मैनेजर। पर कंपनी का नाम वे कभी नहीं लिखेंगे।
दशकों तक किसी और के नाम के भीतर एक ज़िंदगी खड़ी करना, और वह नाम काग़ज़ पर भी आपके बाद नहीं बचता।
टिप्पणी: जिलेट नैरेटिव। एकमात्र मालिक।
फर्दिनांदो
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