जिलेट और तीन का अंक

जिलेट और तीन का अंक — जिलेट, छूटा हुआ टुकड़ा, अध्याय 06

जिलेट, छूटा हुआ टुकड़ा · हिंदी संस्करण  ·  अंक 06

जिलेट और तीन का अंक


तीन का अंक हर दिन मेरा पीछा करता था।

हर पल।

और जब भी मुझे सबसे कम उम्मीद होती, वह सामने आ जाता।

कुछ दिन पहले, जागते ही, मैंने अपने जबड़े के दाहिनी तरफ़ नीचे एक छोटी-सी सूजन देखी।

क़रीब-क़रीब एक गेंद जितनी।

मेरी बीवी ने पूछा कि यह क्या है।

मैंने उसे वही इकलौता जवाब दिया जिसमें कोई तुक थी।

चूँकि मैं काफ़ी समय से सफ़र पर नहीं निकला — शायद इंतज़ार की वजह से, शायद ज़रूरत की वजह से, शायद टेस्टोस्टेरोन के हद से ज़्यादा उत्पादन की वजह से — एक तीसरी गेंद ने उग आने का फ़ैसला कर लिया था।

और उसे कहाँ रखा जाए, यह चुनने वाला मैं नहीं था।

मेरी बीवी मुस्कुराई।

उसने कहा कि बेवक़ूफ़ी बंद करो और डॉक्टर को दिखाओ।

पर किस क़िस्म के डॉक्टर को?

जनरल प्रैक्टिशनर को?

अस्पताल के डॉक्टर को?

स्पेशलिस्ट को?

फ़ैमिली डॉक्टर कम जानता था और लगता था प्रयोगों पर ही जीता है।

अस्पताल का डॉक्टर झटपट दख़ल पर जीता था, कुछ भी साबित करने की मजबूरी के बिना।

स्पेशलिस्ट पैसे लेता था, इसलिए वह मेरे लिए नहीं था।

आपातकालीन चिकित्सा सेवा सबसे बुरे विकल्पों में सबसे अच्छी लगी।

एक महिला डॉक्टर ने दरवाज़ा खोला और पूछा कि मुझे क्या चाहिए।

मैं अब भी गेट के बाहर खड़ा था।

“मुझे पता है कि फल-सब्ज़ी की दुकान बग़ल में है,” मैंने कहा, “पर क्या यह सचमुच मेडिकल क्लिनिक ही है?”

“हाँ। आपको क्या चाहिए?”

“दो किलो केले। अगर आप मुझे अंदर आने दें, तो बता दूँगा कौन-सी क़िस्म के।”

वह मुस्कुराई और गेट खोल दिया।

फिर उसने मेरा चेहरा देखा और मेरी तीसरी गेंद।

दस्ताने निकल आए।

जगह की जाँच हुई।

गलसुआ फ़ौरन ख़ारिज कर दिया गया।

उससे तो मैं चार साल की उम्र में ही बच निकला था।

फ़ैसला आ गया।

एक सूजी हुई लसीका ग्रंथि।

उसकी फ़ौरन जाँच ज़रूरी थी।

ऑपरेशन “डॉक्टरों के लिए गारंटीशुदा आमदनी” बाक़ायदा शुरू हो चुका था।

तीन पर्चे:

एक एंटीबायोटिक।

एक स्टेरॉयड।

एक अल्ट्रासाउंड।

और यह वादा कि तीन दिन बाद आगे की जाँच के लिए लौटूँगा।

फिर उसने एक काग़ज़ लिया और यह समझाते हुए निर्देश लिखने लगी कि अल्ट्रासाउंड कैसे किया जाना चाहिए।

मैं मुस्कुराया।

“क्या आपको सचमुच यक़ीन है कि आपके सहकर्मी को यह जानने के लिए लिखित निर्देश चाहिए कि अल्ट्रासाउंड कैसे होता है?”

“आप ठीक कहते हैं,” उसने जवाब दिया।

फिर आया वह सवाल जिससे बचा नहीं जा सकता था।

“आप काम क्या करते हैं?”

“मैं मरीज़ हूँ।

पर अपना ज़्यादातर वक़्त फल-सब्ज़ी की दुकानों में बिताता हूँ।”

मैं उठ खड़ा हुआ।

“मैं घर जा रहा हूँ।

लहसुन से अपना इलाज करूँगा।

और फिर आपको बता दूँगा।

आप उन गिने-चुने ख़ुशक़िस्मतों में हैं जो सचमुच रिटायरमेंट तक पहुँचेंगे।

एक बार लोगों को इसके असर का पता चल गया, तो आपके कई सहकर्मियों को शायद नया पेशा ढूँढ़ना पड़े।”

जब मैं घर पहुँचा, मेरी बीवी इंतज़ार कर रही थी।

फ़िक्रमंद।

वह जानना चाहती थी कि जाँच में क्या निकला।

मैंने उससे कहा कि फ़िक्र न करे।

जल्द ही मैं फिर सफ़र पर निकलूँगा।

और सूजन शायद ग़ायब हो जाएगी।

शायद जहाज़ के उतरने से भी पहले।


फर्दिनांदो

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