जिलेट, छूटा हुआ टुकड़ा · हिंदी संस्करण · अंक 16
जिलेट होशमंद पागलपन
दृष्टि
मन के दस कमरे
एक घर है जिसमें हममें से हर कोई रहता है, उसे कभी चुने बिना।
उसका कोई पता नहीं। वह किसी नक़्शे पर नहीं मिलता। फिर भी हम उसे उन सब जगहों से बेहतर जानते हैं जहाँ हम सचमुच कभी रहे हैं। भीतर दस दरवाज़े हैं।
कुछ को हम हर दिन खोलते हैं, और हमें पता भी नहीं चलता।
कुछ को हम ताला लगाकर रखते हैं, यह जताते हुए कि उनका हमसे कोई वास्ता नहीं।
और फिर वे कमरे हैं जिन्हें हमने ख़ुद नहीं बनाया, फिर भी न जाने कैसे उन्हें अपने भीतर लिए फिरते हैं। यह कोई सिद्धांत नहीं है।
यह मनोविज्ञान की कोई पोथी नहीं जो किसी ताक़ पर पड़ी धूल खा रही हो।
यह उस आदमी की आपबीती है जो इन दस कमरों से एक-एक करके गुज़रा, अक्सर यह जाने बिना कि वह कहाँ है, और जो अब, कंधों पर कुछ और बरस लिए, उन्हें ठीक वैसा ही बयान करने की कोशिश कर रहा है जैसा उसने उन्हें जिया।
दस दरवाज़े।
मैंने सब खोले।
कुछ जिज्ञासा से।
कुछ बेमन से।
कुछ तभी, जब लौटने के लिए बहुत देर हो चुकी थी।
अगर ये कमरे आपको जाने-पहचाने लगें, तो इसलिए नहीं कि वे मेरी कहानी कहते हैं।
इसलिए कि कहीं बहुत गहरे में वे आपकी कहानी भी कहते हैं।
फर्दिनांदो
होशमंद पागलपन — दृष्टि
एक इलाक़ा है जिसे कम ही लोग पहचानते हैं।
वह अराजकता और स्पष्टता के बीच है।
घाव और समझ के बीच।
ढह जाने और दोबारा जन्म लेने के बीच।
मैं उसे होशमंद पागलपन कहता हूँ।
वहाँ कड़ियाँ दिखाई देने लगती हैं।
मुखौटे गिर जाते हैं।
ब्योरे बोलने लगते हैं।
इसे समझाना मुश्किल है।
जिन्होंने इसे कभी नहीं जिया, वे इसे उलझन समझ बैठते हैं।
सच तो यह है कि यह उसका उलटा है।
यह स्पष्टता की अति है।
एक साथ देखा गया बहुत ज़्यादा यथार्थ।
जो होशमंद पागलपन में जीते हैं, वे भटके हुए नहीं हैं।
वे बस उन जगहों से गुज़र रहे हैं जहाँ दूसरे अभी पहुँचे नहीं।
एक बार हम एक ऐसे ग्राहक के पास गए जो कभी वक़्त पर पैसा नहीं चुकाता था।
उसकी देरी उसे बार-बार बक़ायादारों की सूची में लौटा लाती थी।
बात क्रेडिट मैनेजर तक भी पहुँची।
वह मिलान से आया था।
ज़्यादा विश्लेषण करने वाला।
ज़्यादा तर्कसंगत।
कम भावुक।
फिर भी ग्राहक ने एक न सुनी।
वक़्त गुज़रा।
एक दिन मैं उससे फिर मिला।
मैंने कहा:
“बधाई हो। आपका नाम अब बक़ायादारों की सूची में नहीं है। आख़िरकार आप भी बाक़ी सब जैसे हो गए।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
मुस्कुराया।
और बोला:
“मेरे प्यारे दोस्त, दोबारा देखिए। अगर मैं आपको दिखा नहीं, तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं वहाँ हूँ नहीं।”
उस पल मैं एक बात समझ गया।
होशमंद पागलपन वह देखना नहीं है जो है ही नहीं।
वह उसे देखना है जो है, जबकि बाक़ी सब कहीं और देख रहे हैं।
फर्दिनांदो
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