जिलेट पागलपन

जिलेट पागलपन — जिलेट, छूटा हुआ टुकड़ा, अध्याय 15

जिलेट, छूटा हुआ टुकड़ा · हिंदी संस्करण  ·  अंक 15

जिलेट पागलपन

अति


मन के दस कमरे

एक घर है जिसमें हममें से हर कोई रहता है, उसे कभी चुने बिना।

उसका कोई पता नहीं। वह किसी नक़्शे पर नहीं मिलता। फिर भी हम उसे उन सब जगहों से बेहतर जानते हैं जहाँ हम सचमुच कभी रहे हैं। भीतर दस दरवाज़े हैं।

कुछ को हम हर दिन खोलते हैं, और हमें पता भी नहीं चलता।

कुछ को हम ताला लगाकर रखते हैं, यह जताते हुए कि उनका हमसे कोई वास्ता नहीं।

और फिर वे कमरे हैं जिन्हें हमने ख़ुद नहीं बनाया, फिर भी न जाने कैसे उन्हें अपने भीतर लिए फिरते हैं। यह कोई सिद्धांत नहीं है।

यह मनोविज्ञान की कोई पोथी नहीं जो किसी ताक़ पर पड़ी धूल खा रही हो।

यह उस आदमी की आपबीती है जो इन दस कमरों से एक-एक करके गुज़रा, अक्सर यह जाने बिना कि वह कहाँ है, और जो अब, कंधों पर कुछ और बरस लिए, उन्हें ठीक वैसा ही बयान करने की कोशिश कर रहा है जैसा उसने उन्हें जिया।

दस दरवाज़े।

मैंने सब खोले।

कुछ जिज्ञासा से।

कुछ बेमन से।

कुछ तभी, जब लौटने के लिए बहुत देर हो चुकी थी।

अगर ये कमरे आपको जाने-पहचाने लगें, तो इसलिए नहीं कि वे मेरी कहानी कहते हैं।

इसलिए कि कहीं बहुत गहरे में वे आपकी कहानी भी कहते हैं।

फर्दिनांदो

पागलपन — अति

उन्होंने मुझे पागल कहा।

एक बार नहीं, कई बार।

कभी इसलिए कि मैं बहुत ज़्यादा सोचता था।

कभी इसलिए कि मैं बहुत ज़्यादा महसूस करता था।

और कभी बस इसलिए कि मैं चीज़ों को किसी और कोण से देखता था।

वक़्त के साथ मैं समझ गया कि पागलपन अक्सर वह ठप्पा है जो हम उस चीज़ पर लगा देते हैं जिसे हम किसी ख़ाने में नहीं रख पाते।

फिर भी एक पागलपन ऐसा है जो हद से ज़्यादा संवेदनशीलता से पैदा होता है।

हद से ज़्यादा सवाल करने से।

बिना गहराई की सतहों को क़बूल न कर पाने से।

पागलपन वह कमरा है जहाँ सोच भाषा से तेज़ दौड़ती है।

जहाँ भावनाएँ सब एक साथ आ धमकती हैं।

जहाँ दिल अपने दरवाज़े बंद नहीं कर पाता।

जो भी इससे गुज़रता है, वह कभी वैसे का वैसा बाहर नहीं आता।

क्योंकि उसने कुछ देख लिया है।

और जो देख लिया गया, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

बहुत-से लोग मानते हैं कि पागलपन बुद्धि का उलटा है।

मुझे इस पर यक़ीन नहीं।

कभी-कभी ये दोनों क़रीबी रिश्तेदार होते हैं।

कभी-कभी पागलपन वह बुद्धि है जो अपनी आख़िरी हद तक पहुँच गई है।

वह बिंदु जहाँ उसे अब समेटा नहीं जा सकता।

जहाँ उसे बहुत ज़्यादा कड़ियाँ दिखती हैं।

बहुत ज़्यादा अर्थ।

एक ही वक़्त में बहुत ज़्यादा यथार्थ।

और जब ऐसा होता है, तो भाषा काफ़ी नहीं रहती।

बस इशारा—या चुप्पी—एक अधूरे अनुवादक की तरह बचा रहता है।


फर्दिनांदो

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