जिलेट बरगंडी — अंक 1

जिलेट बरगंडी — अंक 1 — जिलेट, छूटा हुआ टुकड़ा, अध्याय 07

जिलेट, छूटा हुआ टुकड़ा · हिंदी संस्करण  ·  अंक 07

जिलेट बरगंडी — अंक 1

बरगंडी — फ़्रांस
अंक 1 — दूसरी ज़िंदगी का फ़ार्महाउस


कहानियाँ कभी एक जैसी नहीं होतीं, क्योंकि जिन पलों में वे मिलती हैं, वे पल कभी एक जैसे नहीं होते। जगहें बदलती हैं। मौसम बदलते हैं। लोग बदलते हैं। और जब औरतें उनकी राह से गुज़रती हैं, तो हर भविष्यवाणी बेमानी हो जाती है।

यह कहानी मैं कुछ समय पहले सुना चुका हूँ। आज मैं इसे फिर सुनाना चाहता हूँ, पहले से ज़्यादा शिद्दत के साथ, लगभग अपने आप से एक बातचीत की तरह—स्मृति की एक पुकार, एक आवाज़ जो वक़्त के दरवाज़े पर दस्तक देती रहती है, और मुझे याद दिलाती है, न सिर्फ़ उसकी जो हो चुका, बल्कि शायद उसकी भी जो अब भी हो सकता है।

अंक 1 — दूसरी ज़िंदगी का फ़ार्महाउस

बीस साल पहले मैं बरगंडी के लिए निकला था, फ़्रांस के ठीक दिल में, एक पुराना फ़ार्महाउस ख़रीदने के इरादे से।

वह वाइन की, पनीर की, और उस सादी नफ़ासत की धरती थी जिसे फ़्रांसीसी किसी विरासत की तरह सँभालकर रखते हैं। सौदा देख रहे स्थानीय प्रॉपर्टी एजेंट को मैं पहले से जानता था। उसने इस जायदाद को एक दुर्लभ मौक़े के तौर पर पेश किया था, और शर्तें इतनी लुभावनी थीं कि मेरी जिज्ञासा जाग उठी।

मैं कभी सस्ते सौदों का शिकारी नहीं रहा। सस्ते सौदे इंसान की ईजाद हैं। असली मौक़े विधाता के हाथ में होते हैं।

इलाक़ा बड़े कारोबारी रास्तों से दूर था। बाहर से लोग ज़्यादातर अगस्त और सितंबर में अंगूर की तुड़ाई के मौसम में आते थे, या नई वाइन का जश्न मनाने वाले स्थानीय उत्सवों के लिए। साल के बाक़ी दिनों में पहाड़ियों और खेतों पर ख़ामोशी का राज रहता था।

फ़ार्महाउस बेहतरीन हालत में था। उसे थोड़े रखरखाव की ज़रूरत थी, ढाँचे में कुछ फेरबदल की, और निचली मंज़िल पर एक ढंग के दफ़्तर की। कुछ ख़ास मुश्किल नहीं।

पर एजेंट जल्दी में लग रहा था।

एक तूफ़ान आ रहा है, उसने बताया, और सुझाया कि हम घोड़ों पर सवार होकर जागीर का जल्दी से मुआयना कर लें।

बारह हेक्टेयर।

क्षितिज तक फैले अंगूर के बाग़।

लाल वाइन।

सफ़ेद वाइन।

शैम्पेन।

पश्चिम में एक छोटी-सी झील।

अकेशिया के पेड़ों की क़तारें।

अंगूर की बिक्री के चालू अनुबंध।

जब हम जायदाद के बीच से घोड़ों पर गुज़र रहे थे, मैंने पूछा कि मालिक इसे बेच क्यों रहे हैं।

उसका जवाब सीधा था और तोड़ देने वाला।

“मेरी पत्नी को कैंसर है। मैं नहीं चाहता कि वह अपने बचे हुए साल इस जागीर से बँधकर गुज़ारे। जब तक हमसे हो सकता है, मैं उसे दुनिया घुमाना चाहता हूँ।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

अस्तबल लौटकर मेरी नज़र आठ शानदार जवान अरबी घोड़ों पर पड़ी।

मैंने पूरी जायदाद की क़ीमत पूछी।

फ़ार्महाउस।

ज़मीन।

अंगूर के बाग़।

अस्तबल।

घोड़े।

वह आदमी हिचकिचाया।

लग रहा था जैसे वह कहते हुए लगभग डर रहा हो।

फिर उसने कह दिया।

“छह लाख पचास हज़ार यूरो।”

मैंने कुछ पल इस पर सोचा।

अगले दिन हम नोटरी से मिले।

मैंने पूरी रक़म चुका दी।

कोई गिरवी नहीं।

कोई बैंक नहीं।

कोई क़र्ज़ नहीं।

मैं बरगंडी में एक जागीर का मालिक बन गया।

एक अंगूर उगाने वाला।

एक किसान।

यहाँ तक कि एक देहाती भी।

और मन ही मन मुस्कुराते हुए मैंने सोचा कि जिन-जिन लोगों ने दावा किया था कि मैं कुत्ते की तरह लिखता हूँ, उन्हें आख़िरकार मेरे लिए एकदम सही पेशा मिल गया था।


फर्दिनांदो

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