जिलेट, छूटा हुआ टुकड़ा · हिंदी संस्करण · अंक 20
जिलेट लोग
रूपांतरण
मन के दस कमरे
एक घर है जिसमें हममें से हर कोई रहता है, उसे कभी चुने बिना।
उसका कोई पता नहीं। वह किसी नक़्शे पर नहीं मिलता। फिर भी हम उसे उन सब जगहों से बेहतर जानते हैं जहाँ हम सचमुच कभी रहे हैं। भीतर दस दरवाज़े हैं।
कुछ को हम हर दिन खोलते हैं, और हमें पता भी नहीं चलता।
कुछ को हम ताला लगाकर रखते हैं, यह जताते हुए कि उनका हमसे कोई वास्ता नहीं।
और फिर वे कमरे हैं जिन्हें हमने ख़ुद नहीं बनाया, फिर भी न जाने कैसे उन्हें अपने भीतर लिए फिरते हैं। यह कोई सिद्धांत नहीं है।
यह मनोविज्ञान की कोई पोथी नहीं जो किसी ताक़ पर पड़ी धूल खा रही हो।
यह उस आदमी की आपबीती है जो इन दस कमरों से एक-एक करके गुज़रा, अक्सर यह जाने बिना कि वह कहाँ है, और जो अब, कंधों पर कुछ और बरस लिए, उन्हें ठीक वैसा ही बयान करने की कोशिश कर रहा है जैसा उसने उन्हें जिया।
दस दरवाज़े।
मैंने सब खोले।
कुछ जिज्ञासा से।
कुछ बेमन से।
कुछ तभी, जब लौटने के लिए बहुत देर हो चुकी थी।
अगर ये कमरे आपको जाने-पहचाने लगें, तो इसलिए नहीं कि वे मेरी कहानी कहते हैं।
इसलिए कि कहीं बहुत गहरे में वे आपकी कहानी भी कहते हैं।
फर्दिनांदो
लोग — रूपांतरण
मेरी ज़िंदगी उन लोगों से बनी है जिन्हें पता ही नहीं कि वे अब भी उसमें रह रहे हैं।
कुछ रुक गए।
बहुत-से ग़ायब हो गए।
सब कुछ न कुछ छोड़ गए।
एक वाक्य।
एक नज़र।
एक घाव।
एक इलाज।
कुछ मुलाक़ातें दशकों चलती हैं और कुछ भी नहीं बदलतीं।
कुछ मिनटों की होती हैं और पूरी ज़िंदगी की धुरी बदल देती हैं।
इसीलिए मैं कभी किसी को कम नहीं आँकता।
न मेरी बग़ल में बैठे अजनबी को।
न सहकर्मी को।
न राहगीर को।
न संयोग से मिले बूढ़े आदमी को।
हर इंसान अपने साथ एक सच लिए चलता है।
कभी वे हमें कुछ सिखाने आते हैं।
कभी वे हमें यह सिखाने आते हैं कि हम कौन हैं।
और लगभग हमेशा हम यह उनके चले जाने के बहुत बाद समझते हैं।
पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है कि मैंने ख़ुद को अकेले नहीं बनाया।
कोई नहीं बनाता।
हम जो बनते हैं, उसके भीतर हमेशा एक अदृश्य हाथ होता है।
एक सलाह।
एक इनकार।
एक विश्वासघात।
एक हौसला-अफ़ज़ाई।
हम जो हैं, उन सबकी वजह से हैं जिनसे हम मिलते हैं।
उनकी वजह से भी जिन्हें हम भूल चुके हैं।
उनकी वजह से भी जिनसे काश हम कभी न मिले होते।
हम हैं।
और जो कोई इससे उलट कहता है, वह शायद है ही नहीं।
फर्दिनांदो
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