जिलेट मूर्खता

जिलेट मूर्खता — जिलेट, छूटा हुआ टुकड़ा, अध्याय 14

जिलेट, छूटा हुआ टुकड़ा · हिंदी संस्करण  ·  अंक 14

जिलेट मूर्खता

जड़ता


मन के दस कमरे

एक घर है जिसमें हममें से हर कोई रहता है, उसे कभी चुने बिना।

उसका कोई पता नहीं। वह किसी नक़्शे पर नहीं मिलता। फिर भी हम उसे उन सब जगहों से बेहतर जानते हैं जहाँ हम सचमुच कभी रहे हैं। भीतर दस दरवाज़े हैं।

कुछ को हम हर दिन खोलते हैं, और हमें पता भी नहीं चलता।

कुछ पर हम ताला लगाए रखते हैं, यह जताते हुए कि उनका हमसे कोई वास्ता नहीं।

और फिर वे कमरे हैं जिन्हें हमने ख़ुद नहीं बनाया, फिर भी न जाने कैसे उन्हें अपने भीतर लिए फिरते हैं। यह कोई सिद्धांत नहीं है।

यह मनोविज्ञान की कोई पोथी नहीं जो किसी ताक़ पर पड़ी धूल खा रही हो।

यह उस आदमी की आपबीती है जो इन दस कमरों से एक-एक करके गुज़रा, अक्सर यह जाने बिना कि वह कहाँ है, और जो अब, कंधों पर कुछ और बरस लिए, उन्हें ठीक वैसा ही बयान करने की कोशिश कर रहा है जैसा उसने उन्हें जिया।

दस दरवाज़े।

मैंने सब खोले।

कुछ जिज्ञासा से।

कुछ बेमन से।

कुछ तभी, जब लौटने के लिए बहुत देर हो चुकी थी।

अगर ये कमरे आपको जाने-पहचाने लगें, तो इसलिए नहीं कि वे मेरी कहानी कहते हैं।

इसलिए कि कहीं बहुत गहरे में वे आपकी कहानी भी कहते हैं।

फर्दिनांदो

मूर्खता — जड़ता

बरसों मैं मानता रहा कि मूर्खता और अज्ञान एक ही चीज़ हैं।

फिर मेरी राय बदल गई।

मैंने कम पढ़े-लिखे लोग देखे जो दुनिया को समझते थे।

और बड़ी-बड़ी डिग्रियों वाले लोग देखे जो ख़ुद को नहीं समझ पाते थे।

मूर्खता ज्ञान की कमी नहीं है।

वह ज्ञान से इनकार है।

वह उसी पल शुरू होती है जब हम सवाल पूछना बंद कर देते हैं।

वह यह मान लेने का आराम है कि जो हम जानते हैं, वही काफ़ी है।

मूर्खता को अटल यक़ीन से प्यार है।

बारीकियों से उसे नफ़रत है।

शक पर भरोसा नहीं करती।

जवाब हमेशा तैयार रखती है।

और इसी वजह से कभी सुनती नहीं।

जब मूर्खता आती है, विकास रुक जाता है।

और जब विकास रुक जाता है, ज़िंदगी चलती रहती है।

मगर हमारे बिना।

कभी-कभी वह लगभग एक सामाजिक बीमारी बन जाती है।

मुझे एक माँ याद है जो अपने आठ बच्चों को डॉक्टर के पास ले गई।

वह परेशान थी।

उसकी ज़िद थी कि उनमें से बस एक ही बुद्धिमान है, और वह चाहती थी कि बाक़ी सात को सुधार दिया जाए।

डॉक्टर ने हिम्मत नहीं हारी।

सात परामर्श।

सात नुस्ख़े।

सात बिल।

माँ संतुष्ट होकर लौटी।

उसे एक निदान मिल गया था।

उसके मुताबिक़, उसके बच्चे जल्द ही बदल जाएँगे।

वे जस के तस रहे।

बस और ग़रीब।

कोई इलाज नाकाम नहीं हुआ था।

बात बस इतनी थी कि बीमारी वह थी ही नहीं।

बीमारी ख़ुद उसकी थी।

और कोई नुस्ख़ा उसे ठीक नहीं कर सकता था।


फर्दिनांदो

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